ईंताजार

एक मद्धम सी खुशबू, हवा के झोंके से बोली

ले कर चल मुझको वहा, जहा वो बैठा होगा

गुम उन जुल्फो की यादो मे


जिन जुल्फो को छू कर तुम यूँ गुजर रहे हो

बार-बार इनसे उलझने को मचल रहे हो

कभी तो मेरा एक भी कतरा उस तक पहुचा दो तुम

उसके जीवन को भी थोडा सा महका दो तुम

नही तो हर एक दिन वो यूँही झील किनारे

रहेगा तकता, राह वो मेरी साँझ सघारे

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