भोर का भ्रम

एक भोर जब आँख खुली, एक स्वपन देख कर

हुआ अचम्भित, आस पास का द्रश्य देख कर

दिखी दूर उस भीगी घांस पर, धुन्ध की एक दीवार

मन ने सोचा झांक के देखूँ , क्या है उसके पार


तभी ह्रदय के किसी कोने मे, जन्मा एक विचार

क्या बसा हुआ उस तरफ, मेरे उन सपनो का संसार

जिन सपनो को देखा था कभी, आँखो मे रुपहली धूप लिये

उनमे से तो कुछ अपने ही थे, और कुछ मेरे अपनो के लिये

उन सपनो से मिलने के लिये, जैसे ही बढा उस ओर

बदल गयी बस पलक झपकते ही, वो भीगी भोर

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