रंग

रंग, जब एक कवि ने लिये
तो कर दिया प्रेमिका के रूप का वर्णन
गालो का रंग गुलाबी, और आँखे कथायी
कभी अधर थे लाल, और बिखरे से थे सुनहरी बाल

कुछ रंग एक चित्रकार ने लिये
और छिड़क दिया आकाश कुछ नीला सा
दिया एक रंग सूरज की आग को
एक रंग नदी के प्रवाह को

रंग जब आया एक माँ की जुबान पे
तो बेटे को मेरे “लाल” कहा था
और रंग
जो लगा एक गोपी के गाल पे
तो गुलाल बना था

फिर रंग मिले कुछ मौका-परस्तो को
और उनकी फितरत ही बदल दी
जो रंग बस घुलना जानते थे एक दूजे में
उन्हें नफरत भी आ गयी

हर रंग अब तेरा – मेरा हो गया ,
गावं-शहर, गली- महोल्ला
उत्तर-दखिन, ईश्वर-अल्ला,
सबका रंग पराया सा हो गया

अब ये सोचता हूँ कि
जब मिलेंगे न रंग एक दूजे से
तो कैसे कोई तस्वीर बनेगी
न होगा गर सम्मान हर रंग का
तो कैसे मेरे देश की तक़दीर बनेगी

सभी रंगो की किरणों से
मिल कर बनता है उजियारा
श्वेत शांति रंग है दुर्लभ,
यदि… एक रंग भी दुखियारा

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