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भोर का भ्रम

एक भोर जब आँख खुली, एक स्वपन देख कर

हुआ अचम्भित, आस पास का द्रश्य देख कर

दिखी दूर उस भीगी घांस पर, धुन्ध की एक दीवार

मन ने सोचा झांक के देखूँ , क्या है उसके पार

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