Yearly Archives: 2004

बूँद

एक बूँद, डगमगाती, पर रुकी हुई मेरी हथेली पर

जगमगाती, झिलमिलाती, व्याकुल सी फिसलने को

कभी तो एहसास दिलाती अपनी स्थिरता का

अगले ही पल बदलती है रुप अनिश्चितता का
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सुबह

हर शाम जिन्दगी, सोचती है उस सुबह के बारे मेँ

जो आज आयी थी, आयी थी और, सूरज की किरणो मे भर

कितनी आशाऐँ लायी थी

उजाला ऐसी शक्त्ति का, जो मेरे अरमानो को पहचान ने

और पूरा करने मे मेरे साथ रहती
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