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रंग

रंग, जब एक कवि ने लिये
तो कर दिया प्रेमिका के रूप का वर्णन
गालो का रंग गुलाबी, और आँखे कथायी
कभी अधर थे लाल, और बिखरे से थे सुनहरी बाल

कुछ रंग एक चित्रकार ने लिये
और छिड़क दिया आकाश कुछ नीला सा
दिया एक रंग सूरज की आग को
एक रंग नदी के प्रवाह को

रंग जब आया एक माँ की जुबान पे
तो बेटे को मेरे “लाल” कहा था
और रंग
जो लगा एक गोपी के गाल पे
तो गुलाल बना था

फिर रंग मिले कुछ मौका-परस्तो को
और उनकी फितरत ही बदल दी
जो रंग बस घुलना जानते थे एक दूजे में
उन्हें नफरत भी आ गयी

हर रंग अब तेरा – मेरा हो गया ,
गावं-शहर, गली- महोल्ला
उत्तर-दखिन, ईश्वर-अल्ला,
सबका रंग पराया सा हो गया

अब ये सोचता हूँ कि
जब मिलेंगे न रंग एक दूजे से
तो कैसे कोई तस्वीर बनेगी
न होगा गर सम्मान हर रंग का
तो कैसे मेरे देश की तक़दीर बनेगी

सभी रंगो की किरणों से
मिल कर बनता है उजियारा
श्वेत शांति रंग है दुर्लभ,
यदि… एक रंग भी दुखियारा

विजय

विजय
असत्य पर सत्य की
है ये विश्वास, या बस है आस ?

असत्य के विशाल हाँथ
सहस्त्र सर है साथ-साथ
है घोर शोर उसका बस
उसी का बोल बाला है
वो श्वेत है, न काला है
वो अन्धकार में नहीं
उसी पे सब उजाला है

फिर कौन है अँधेरे में
दबी दबी आवाज़ में
वो सत्य है डरा-डरा
है झांकता जरा-जरा
प्रबल नहीं है, क्षीण है…

विजय
असत्य पर सत्य की
है ये विश्वास, या बस है आस ?

लम्हे

एक ऐसे लम्हे की तलाश, जिसमें खुद को पाऊ
या ऐसे ही गुजरते लम्हों में, खुद को खोता जाऊ

कुछ लम्हे हांथो से बीन-बीन, रखे मिट्टी के बर्तन में
एक कोशिश उनको थामने की, ये सोच ही रहा था कि

कुछ बीत गये झगमग करते, और कुछ धुंधले से थमे हुए
जाने दू उनको भी मैं गुजर, या थाम के कोई जतन करू

बेरंग

मैने मेरे ज्ञान से पूछा, बता, गर पता तुझको है
हर दिन जो ये नया सा लगता
जीवन उसमे नया क्या है ?

वो ही तमाशे, वो ही है मेले फिर भी हर पल लगे अकेले
खुद से सब अंजान है क्यो?

हर चेहरा, हर सुबह अनोखा रंग भरे आँखो मे हजारो
निकल पडे लेने को ट्क्कर
इस जग की हर चट्टानो से

शाम ढले, बेरंग सा हो कर हर चेहरा क्यो दिखता य़ू बजारो मे
जैसे अपना ही कोई रंग
ढूढता उन गलियारो मे

जिन गलियारो मे, झिलमिल करती रंगबिरंगी, टिम-टिम करती
कितनी है रोशनी, उन बत्तियोँ की फिर भी जो रंग सुबह था चेहरे पे
वो दिखा नही इन रंगीन उजियारो मे

ऐ हवा

ऐ हवा
मुझसे भी तो दो बाते करती जा

बैठा हूँ यहाँ ऐसे की
सिर्फ तुझसे ही बस मेरा मिलन हो

मुझ को यूँ छू कर जो गुजर रही है
एक पल को भी न ठहर रही है
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