All posts by vikas

वास्तविक्ता

कभी वो चित्र आँखो के सामने फिर से प्रकट होता

वो चित्र जिसे कई बार मन की दीवारो पर अपनी आशाओ के

रंगो से बनाया था, कभी अकेले और कभी किसी के साथ मिल कर
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पल

वक्त की बदलती हवाओ ने

अक्सर ऐसे मोड पर ला कर छोडा है

जहाँ कुछ राहे आपस मे मिलती है

दिखती है अलग दिशाओ को जाती

पर सभी अतीत के, किसी धागो से जा कर मिलती है

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लकीरो के निशान

कागज पर बना कर, मिटाई गई लकीरो के कुछ बचे हुऐ निशान
ढूंढते है उन गायब हिस्सो को, जिनसे मिले हुऐ थे कभी
आडी तिरछी लकीरो के, एक अजब से समूह थे कभी
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बूँद

एक बूँद, डगमगाती, पर रुकी हुई मेरी हथेली पर

जगमगाती, झिलमिलाती, व्याकुल सी फिसलने को

कभी तो एहसास दिलाती अपनी स्थिरता का

अगले ही पल बदलती है रुप अनिश्चितता का
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